Floor Test क्या होता है, कितने तरह का होता है? यह भी जानें- कम्पोजिट फ्लोर टेस्ट का मतलब क्या है

by Republican Desk

Floor Test की बात आज हर तरफ हो रही है। झारखंड में आज यह टेस्ट हुआ है और बिहार में 12 फरवरी को होना है।आखिर क्या होता है फ्लोर टेस्ट? आइए, समझते हैं।

बिहार में सीएम नीतीश कुमार को 12 फरवरी को फ्लोर टेस्ट के लिए उतरना है।

झारखंड के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने विधानसभा में फ्लोर टेस्ट (Jharkhand Floor Test) पास कर लिया है। अब बारी बिहार में फ्लोर टेस्ट (Floor Test) की है। नीतीश सरकार को फ्लोर टेस्ट से गुजरना है। 12 फरवरी को फ्लोर टेस्ट की तारीख तय है। ऐसे में फ्लोर टेस्ट से जुड़ी दिलचस्प बातें जानना जरूरी है।

क्या होता है Floor Test?

फ्लोर टेस्ट की स्थिति तब बनती है जब केंद्र या किसी राज्य में सियासी संकट बन जाता है। मुख्यमंत्री को विधानसभा में यह साबित करना होता है कि पार्टी विधायक उसके साथ हैं या नहीं। मतलब उन्हें बहुमत प्राप्त है या नहीं, इसे साबित करना होता है। राज्यपाल मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहते हैं। जो भी पार्टी विधानसभा में बहुमत साबित करने में सफल साबित होती है, राज्यपाल उस पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं। फ्लोर टेस्ट के बारे में लोगों के जेहन में कई तरह के सवाल होते हैं, उसका जवाब सामान्य ज्ञान संघय लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा (What is floor test UPSC) के लिए भी जरूरी होता है।

फ्लोर टेस्ट में फेल हुए तो क्या होगा?

अगर वह मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट में विश्वास मत जुटाने में असफल साबित होता है तो उन्हें इस्तीफा देना होता है। यह एक संवधौनिक प्रक्रिया है। विधानसभा हो या संसद, दोनों में फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया एक जैसी होती है। इस दौरान विधायकों (विधानसभा) या सांसदों (लोकसभा) की मौजूदगी जरूरी होती है। जैसे, बिहार में 12 फरवरी को यह होगा तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को साबित करना होगा कि उन्हें दो तिहाई, यानी बिहार विधानसभा की कुल विधायक क्षमता 243 में से 122 विधायकों का समर्थन हासिल है।

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कितने तरह का होता है फ्लोर टेस्ट?

हालातों के हिसाब से देखें तो फ्लोर टेस्ट दो तरह का होता है। एक फ्लोर टेस्ट सामान्य, जबकि दूसरा कम्पोजिट होता है। सामान्य फ्लोर टेस्ट तब होता है जब कोई राजनीतिक दल या गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाता है और उसे विश्वास मत साबित करना होता है, या राज्यपाल को लगता है कि सरकार सदन में विश्वास खो चुकी है। ऐसे हालत में मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट के जरिए विश्वास मत को साबित करते हैं। अब कम्पोजिट फ्लोर टेस्ट को समझ लेते हैं। ऐसे टेस्ट की नौबत तब आती है जब एक से ज्यादा नेता सरकार बनाने के लिए दावा पेश करते हैं। राज्यपाल इसके लिए विशेष सत्र बुलाते हैं। सदन में विधायक खड़े होकर या हाथ उठाकर वोट करते हैं।

झारखंड में चंपाई सोरेन फ्लोर टेस्ट में पास

झारखंड में विधानसभा में विशेष सत्र की कार्यवाही में सीएम चंपाई सोरेन ने विश्वास मत का प्रस्ताव पेश किया था। इस दौरान विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 47 वोट पड़े तो वहीं विपक्ष में 29 वोट पड़े। इस तहर उन्होंने फ्लोर टेस्ट पास कर लिया। झारखंड विधानसभा में कुल 81 विधानसभा सीटें हैं। हालांकि यहां एक सीट खाली है। इस तरह यहां बहुमत का आंकड़ा 41 है।

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