Bihar News : रूबन मेमोरियल हॉस्पिटल में महिला की मौत पर हंगामा, सीनियर डॉक्टर देखने नहीं आए, महिला ने तोड़ा दम

Bihar News में खबर बिहार के स्वास्थ्य महकमे से जुड़ी हुई। लाख दावों के बावजूद मेडिकल माफिया मरीजों पर अपनी मनमानी करने से बाज नहीं आ रहे हैं। पटना के पाटलिपुत्र स्थित रूबन हॉस्पिटल पर गंभीर आरोप लगा है।

रूबन मेमोरियल हॉस्पिटल में महिला की मौत के बाद बिलखते परिजन

बिहार में मेडिकल माफियाओं के आगे स्वास्थ्य महकमा नतमस्तक नजर आता है। प्राइवेट अस्पतालों के की मनमानी इतनी है कि उन्हें ना तो स्वास्थ्य विभाग का डर है और ना ही मरीज के परिजनों के आंसू से उन्हें कोई फर्क पड़ता है। राजधानी पटना के पाटलिपुत्र स्थित रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल पर एक बार फिर एक गंभीर आरोप लगा है। आरोप है कि हार्ट की एक पेशेंट को एडमिट करने के बाद कोई भी सीनियर डॉक्टर मरीज को देखने नहीं आए। लिहाजा मरीज की मौत हो गई। मृतक की बिलखती हुई बेटी इस मौत की पूरी दास्तान सुना रही है और सरकार से जवाब मांग रही है। लेकिन सवाल यह है की ऐसे प्राइवेट अस्पतालों पर नकेल कसने की हिम्मत क्या सरकार के भीतर है?

हार्ट के मरीज को भर्ती किया, स्पेशलिस्ट क्यों नहीं आए देखने?

सीतामढ़ी की रहने वाली प्रियंका कुमारी ने बताया कि उनकी मां उषा देवी दिल की मरीज थी। गुरुवार की रात तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें रुबन मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल की ओर से कहा गया था कि उन्हें बेहतर इलाज की सुविधा मिलेगी। मरीज को आईसीयू में भर्ती कर दिया गया। लेकिन हैरत की बात यह है कि बृहस्पतिवार की रात से लेकर शुक्रवार की सुबह तक हार्ट के स्पेशलिस्ट डॉक्टर को नहीं बुलाया गया। प्रियंका कुमारी का आरोप है कि उनकी मां का इलाज एक जूनियर डॉक्टर द्वारा कराया जा रहा था। जब बीमारी हार्ट की थी तो हार्ट के स्पेशलिस्ट को क्यों नहीं बुलाया गया? यही वजह रही की मरीज की स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती गई और आखिर में शुक्रवार की सुबह अस्पताल ने प्रियंका को बताया कि उनकी मां की मौत हो गई है। प्रियंका के आरोप इसलिए गंभीर हैं क्योंकि प्राइवेट अस्पतालों के पास अगर किसी भी बीमारी के स्पेशलिस्ट डॉक्टर मौजूद नहीं होते हैं तो नियमतः उन्हें मरीज को भर्ती नहीं करना चाहिए। किसी जूनियर डॉक्टर के भरोसे या किसी एमडी के भरोसे क्या हार्ट के पेशेंट का इलाज किया जा सकता है? यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि अक्सर या देखने को मिलता है कि अस्पताल मरीज को पैसे के लिए भर्ती तो कर लेते हैं, लेकिन उनके पास उस खास बीमारी के डॉक्टर ही मौजूद नहीं होते हैं।

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हॉस्पिटल की दलील : एमडी देख न रहे थे, सीनियर मतलब क्या होता है

इस मामले में हमने रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल के प्रबंधन से भी बात की। ओपीडी मैनेजर अविनाश ने बताया कि महिला का वॉल्व रिप्लेसमेंट के लिए 3 साल से परिजनों को कहा जा रहा था। लेकिन उन्होंने रिप्लेसमेंट नहीं कराया। रात में जब मरीज इमरजेंसी में पहुंची तो उनका हार्ट रुक गया था। तब जो भी डॉक्टर वहां मौजूद थे, उन्होंने इलाज किया। उसके बाद उन्हें वेंटिलेटर लगाया गया। सर्जरी की स्थिति नहीं थी। सीनियर डॉक्टर के नहीं आने के सवाल पर ओपीडी इंचार्ज अविनाश ने कहा कि प्रियंका का आरोप गलत है। उन्होंने यह दलील भी दी की कैजुअल्टी कंपाउंड से नहीं चलती है। एमडी डॉक्टर रहते हैं। हालांकि बातचीत के दौरान अविनाश ने यह भी कहा की कंसलटेंट नहीं आते हैं। एमडी डॉक्टर तो थे। सीनियर और किसे कहा जाए?

अस्पताल प्रबंधन की दलील में कितना दम?

अस्पताल प्रबंधन की दलील कितनी सही है यह समझना आसान है। सवाल फिर वही है कि मरीज अगर हृदय रोग से ग्रसित है तो हृदय रोग से जुड़े डॉक्टर को तत्काल क्यों नहीं बुलाया गया? आखिर क्यों रात भर इस बात का इंतजार किया जाता रहा कि जब सुबह होगी तो स्पेशलिस्ट डॉक्टर को बुलाया जाएगा? अब जबकि रात भर में महिला की मौत हो गई है तो इस मौत का दोषी किसे माना जाए? पटना में प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी स्वास्थ्य महकमे की कमजोरी को बयां करने के लिए काफी है। मरीज इसी तरह बड़े-बड़े अस्पतालों में अपने परिजन को बचाने के लिए लाखों रुपए फूंक देते हैं और अंत में उनके हाथ आता है उनके परिजन का शव। क्योंकि अस्पताल प्रबंधन मरीज को इलाज के नाम पर भर्ती तो कर लेता है, लेकिन मरीज को जिस डॉक्टर की जरूरत होती है वे डॉक्टर अस्पताल के पास होते ही नहीं हैं।

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